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भाषा की जकड़बंदी

भाषा की जकड़बंदी

भाषा को बरतने वाले ही यह निर्धारित नहीं करते कि वे इसे कैसे बरतें बल्कि भाषा में खुद भी इतनी ताकत होती है कि बरतने वाले को एक खास ढांचे के भीतर ही ऐसा करने की छूट देती है। चाह कर भी इस पूर्व निर्धारित ढांचे को तोड़ना बहुत मुश्किल होता है। मासूम बच्चों के अलावा शिक्षित और जागरूक लोग भी भाषा के चक्रव्यूह में बार-बार फंसते दिखते हैं। सामान्य बातचीत या बोलचाल में कही गई बात को हो सकता है बोलने वाले ने किसी और संदर्भ में व्यक्त किया हो या अलग मायने में कहा हो लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से भाषा सदियों से जड़ जमा कर बैठे पूर्वाग्रहों कुंठाओं विषमता या भेदभाव के रूपों को प्रकट कर जाती है।
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